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त्वचा मोटी हो रही है, कहीं स्क्लेरोडर्मा तो नहीं? – What is Scleroderma in Hindi

स्क्लेरोडर्मा एक दुर्लभ बीमारी है, जिसे त्वग्काठिन्य भी कहते हैं। ‘स्कलेरो’ का अर्थ कठोर होना और ‘डर्मिस’ का संबंध त्वचा से है। इसमें कनेक्टिव टिश्यू डिसआर्डर यानी टिश्यू से संबंधित समस्या होती है, जिसके कारण त्वचा मोटी और सख्त हो जाती है। 

आसान शब्दों में स्क्लेरोडर्मा का अर्थ बताएं, तो यह शरीर के स्वस्थ्य टिश्यू को प्रभावित करके त्वचा को कठोर बनाने वाली बीमारी है (1)।

स्क्लेरोडर्मा की समस्या 30 से 50 साल की उम्र के लोगों को प्राभावित कर सकती है। इसका एक प्रकार पुरुषों की अपेक्षा महिलओं को अधिक प्रभावित करता है (1)। 

एक अन्य वैज्ञानिक लेख में इस बात का जिक्र मिलता है कि स्क्लेरोडर्मा एक प्रकार का ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर हमला कर उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है (2)।

त्वग्काठिन्य के बारे में जानने के बाद स्क्लेरोडर्मा के प्रकार पर एक नजर डाल लें।

स्क्लेरोडर्मा के प्रकार- Types of Scleroderma in Hindi

स्क्लेरोडर्मा यानी त्वग्काठिन्य दो प्रकार के होते हैं, जिनके बारे में हम नीचे विस्तार से बता रहे हैं।

1. लोकलाइज्ड स्क्लेरोडर्मा (Localized scleroderma): स्क्लेरोडर्मा रोग का यह प्रकार मुख्य रूप से त्वचा को प्रभावित करता है। इससे मांसपेशियां और हड्डियां प्रभावित हो भी सकती हैं और नहीं भी। यह स्कलेरोडर्मा ज्यादातर महिलाओं को ही होता है। 

प्रतिवर्ष लगभग एक लाख में से 3 महिलाएं इसकी चपेट में आती हैं। लोकलाइज्ड स्क्लेरोडर्मा व्यक्ति के शरीर के जिस हिस्से को यह प्रभावित करता है, उसी हिसाब से इसे दो भागों में बांटा जाता है, जिसमें से एक है मोर्फिया और दूसरा लीनियर स्कलेरोडर्मा है (1)।

मोर्फिया: मॉर्फिया के मामलों वयस्कों में ज्यादा देखे जाते हैं। इसे स्क्लेरोडर्मा का प्लाक फॉर्म भी कहा जाता है (1)। प्लाक का अर्थ हुआ स्किन के ऊपर बनना वाला छोटा और आसामान्य पैच। इससे हाथ और पैरों को छोड़कर छाती, पेट और लिंब की त्वचा प्रभावित होती है (2)।

यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, लेकिन बहुत कम मामलों में पूरे शरीर तक फैलता है। इससे अंदरुनी अंगों के विफल होने यानी इंटरनल ऑर्गन फेलियर का खतरा भी ना के बराबर होता है (2)। रिसर्च में कहा गया है कि प्लाक के फैलने के पैर्टन के आधार पर इसे कई अन्य उप-प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है (1)

लीनियर स्क्लेरोडर्मा: यह स्क्लेरोडर्मा मोटा और सख्त होता है, जो त्वचा पर बैंड यानी पट्टे जैसा दिखाई देता है। यह स्कलेरोडर्मा चेहरे या हाथों पर हो सकता है। रिसर्च के अनुसार, लीनियर स्क्लेरोडर्मा ज्यादातर बच्चों को प्रभावित करता है (1)।

2. सिस्टमिक स्क्लेरोडर्मा (Systemic scleroderma): स्क्लेरोडर्मा का यह रूप सबसे गंभीर होता है, क्योंकि यह कई आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकता है। इसमें त्वचा के साथ ही हृदय, फेफड़े और किडनी भी शामिल हैं (2)। 

पाचन तंत्र को भी सिस्टमिक स्कलेरोडर्मा प्रभावित कर सकता है। यूं तो यह स्क्लेरोडर्मा किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन इसे बच्चों और बुजुर्गों में दुर्लभ माना जाता है। यह रोग 30 से 50 वर्ष की आयु के व्यक्तियों को सबसे अधिक प्रभावित करता है (1)।

आगे हम आपको त्वग्काठिन्य के कारण बता रहे हैं।

स्क्लेरोडर्मा के कारण – Causes of Scleroderma in Hindi

वैज्ञानिकों के अनुसार, त्वग्काठिन्य के कारण पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। हां, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि आनुवंशिक यानी जेनेटिक और पर्यावरणीय कारक स्क्लेरोडर्मा की उत्पत्ति का कारण हो सकते हैं (1)। इनके बारे में और इसके कुछ अन्य कारक के बारे में आगे विस्तार से पढ़ें (3)।

  • जेनेटिक मेकअप: स्क्लेरोडर्मा से प्रभावित माता-पिता या फिर किसी करीबी रिश्तेदार में मौजूद प्रभावित जीन से आने वाली पीढ़ी में स्क्लेरोडर्मा होने की आशंका बढ़ सकती है।

    दरअसल, रिश्तेदारों द्वारा ही यह जीन एक-दूसरे तक पहुंचते हैं। ये स्क्लेरोडर्मा के प्रकार में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

    मतलब अगर कोई रिश्तेदार किसी खास प्रकार के स्क्लेरोडर्मा से प्रभावित है, तो उस पीढ़ी में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों में उसी प्रकार के स्क्लेरोडर्मा होने का खतरा हो सकता है।
  • वातावरण: वातावरण में चीजों के संपर्क में आना, जैसे कि वायरस या रसायन शामिल होते हैं। इनसे भी स्क्लेरोडर्मा होने का जोखिम रहता है, क्योंकि यह इस परेशानी को ट्रिगर यानी शुरू कर सकते हैं।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली में परिवर्तन: जब प्रतिरक्षा प्रणाली बदलती है, तो यह शरीर में बहुत अधिक कोलेजन बनाने के लिए कोशिकाओं को प्रेरित कर सकती है। बहुत ज्यादा कोलेजन बनने त्वचा में ज्यादा कसी हुई दिखती है और उसमें कठोर पैच बनने लगते हैं।
  • हार्मोन: महिलाओं और पुरुषों के बीच हार्मोनल अंतर होता है। कुछ-कुछ मामलों में देखा गया है कि महिलाओं में पाए जाने वाले हार्मोन स्क्लेरोडर्मा रोग का कारण बन सकते हैं।

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कारण के बाद जानते हैं त्वग्काठिन्य के लक्षण के बारे में।

त्वग्काठिन्य (स्क्लेरोडर्मा) के लक्षण – Symptoms of Scleroderma in Hindi

त्वग्काठिन्य रोग में विभिन्न प्रकार के लक्षण नजर आ सकते हैं। यहां हम स्क्लेरोडर्मा के कारण प्रभावित होने वाले सभी अंगों से जुड़े लक्षण बता रहे हैं (2)।

त्वचा संबंधी लक्षण:

  • ठंडे तापमान में हाथ या पैर की उंगलियां नीली या सफेद होना
  • उंगलियों, हाथों, बांह की कलाई और चेहरे की त्वचा की जकड़न और अकड़न
  • बाल झड़ना
  • त्वचा का रंग अधिक गहरा या फिर हल्का हाेना
  • त्वचा के नीचे कैल्शियम की छोटी-छोटी सफेद गांठें बन जाना
  • उंगलियों या पैर की उंगलियों पर घाव (अल्सर)
  • चेहरे की त्वचा का सख्त हाे जाना
  • टेलंगिएक्टेसियास, चेहरे में और नाखूनों के किनारों छोटी व चौड़ी रक्त वाहिकाएं दिखना

हड्डी और मांसपेशियों से संबंधित लक्षण:

  • जोड़ों में दर्द, जकड़न और सूजन, जिसके कारण कार्य करने में परेशानी हो
  • ऊतक और टेंडन के आसपास फाइब्रोसिस के कारण हाथों का अक्सर अकड़ना
  • पैरों के पंजों में सुन्नपन और दर्द होना

सांस से जुड़े लक्षण:

  • सूखी खांसी
  • सांस लेने में कठिनाई
  • घरघराहट
  • फेफड़ों के कैंसर का बढ़ा खतरा

पाचन तंत्र से जुड़े लक्षण:

  • निगलने में कठिनाई
  • इसोफेजियल रिफ्लक्स या हार्टबर्न
  • खाना खाने के बाद पेट फूलना
  • कब्ज की समस्या
  • दस्त की परेशानी
  • मल को नियंत्रित करने में समस्या

हृदय से जुड़े लक्षण:

  • असामान्य हृदय गति
  • हृदय के चारों ओर तरल पदार्थ होना
  • हृदय की मांसपेशियों के टिश्यू का मोटा हाेना, जिससे हृदय की कार्यक्षमता में कमी आए

किडनी और जननांग से संबंधित लक्षण:

  • किडनी फेल
  • पुरुषों में स्तंभन दोष
  • महिलाओं की योनि में सूखापन

आगे पढ़ें

लेख के अगले भाग में हम त्वग्काठिन्य के जोखिम कारक बताएंगे।

त्वग्काठिन्य (स्क्लेरोडर्मा) के जोखिम कारक – Risk Factors of Scleroderma in Hindi

स्क्लेरोडर्मा किसी को भी हो सकता है, लेकिन अगर किसी के परिवार में यह समस्या चली आ रही है, तो यह अपने आप में ही स्कलेरोडर्मा होने का सबसे बड़ा जोखिम कारक हो सकता है। इसके अलावा, स्क्लेरोडर्मा के जोखिम कारक कुछ इस प्रकार हो सकते हैं (4) (1)।

  • प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव होना
  • मध्य आयु वर्ग के लोग
  • महिला होना अपने आप में ही स्क्लेरोडर्मा का जोखिम कारक है
  • पॉलिशिंग और ग्राइंडिंग में इस्तेमाल होने वाला सिलिका केमिकल का संपर्क
  • कुछ कार्बनिक सॉल्वैंट्स के संपर्क में आने से
  • ब्लड वेसल डैमेज होना
  • टिश्यू में घाव लगना, जिसे भरने के लिए स्कार टिश्यू का ज्यादा बनना

लेख में बने रहें

अब आगे बढ़ते हुए स्क्लेरोडर्मा के निदान के बारे में जान लीजिए।

त्वग्काठिन्य रोग का निदान- Diagnosis of Scleroderma in Hindi

त्वग्काठिन्य रोग के निदान के लिए डॉक्टर कई प्रकार की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इनके बारे में हम नीचे बता रहे हैं (2)।

  • शारीरिक परीक्षण: इसमें डॉक्टर उंगलियों, चेहरे या अन्य जगहों पर त्वचा की मोटाई की जांच, नाखूनों के किनारे की त्वचा, फेफड़े, हृदय और पेट की जांच के साथ ही ब्लड प्रेशर की जांच कर सकते हैं।
  • खून और पेशाब की जांच: त्वग्काठिन्य रोग का निदान करने के लिए डॉक्टर लैब में एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी (एएनए) पैनल, स्क्लेरोडर्मा एंटीबॉडी परीक्षण, कम्पलीट ब्लड काउंट, हृदय की मांसपेशियों का परीक्षण और पेशाब की जांच करने की सलाह दे सकते हैं।
  • अन्य परीक्षण: स्क्लेरोडर्मा के निदान के लिए चेस्ट का एक्स-रे, फेफड़ों का सीटी स्कैन, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी), इकोकार्डियोग्राम, त्वचा की बायोप्सी जैसे परीक्षण करवाने के लिए भी डॉक्टर कह सकते हैं।

अंत तक पढ़ें

निदान की जानकारी के बाद अब पढ़िए त्वग्काठिन्य का इलाज कैसे किया जा सकता है।

त्वग्काठिन्य (स्क्लेरोडर्मा) का इलाज – Treatment of Scleroderma in Hindi

शोधकर्ताओं के अनुसार फिलहाल स्क्लेरोडर्मा का कोई सटीक इलाज मौजूद नहीं है। फिर भी कुछ उपायों को अपनाकर इसके लक्षण और रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है। यहां हम उन्हीं उपायों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं (1)।

1. मेडिसिन

स्क्लेरोडर्मा की समस्या हो दूर करने वाली दवा का अभी तक इजात नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी कुछ दवाओं का उपयोग कर स्क्लेरोडर्मा के लक्षणों को नियंत्रित करने और जटिलताओं को रोकने में मदद मिल सकती हैं। इनमें निम्न दवाओं को शामिल किया गया है (2):

  • हार्मोन को नियंत्रित करने वाली कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स दवाएं। हालांकि, इनका उपयोग डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली को सप्रेस यानी दबाने वाली दवाएं।
  • गठिया की समस्या में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाओं का उपयोग किया जा सकता है।
  • हार्टबर्न को कम करने वाली और निगलने की समस्याओं के लिए दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • रक्तचाप को कम करने की दवाएं स्क्लेरोडर्मा के कारण होने वाले उच्च रक्तचाप या किडनी की समस्याओं में उपयोगी हो सकती हैं।
  • समस्या की रोकथाम के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन डॉक्टर की सलाह पर कर सकते हैं (1)।
  • किडनी की समस्या में एसीई इनहिबिटर्स का उपयोग भी फायदेमंद हो सकता है। एसीई इनहिबिटर्स मुख्य रूप से उच्च रक्तचाप और हृदय की समस्या के उपचार के लिए उपयोग की जाने वाली दवाओं का एक वर्ग है (1)।
  • रक्त को जमने से रोकने के लिए एंटीकोआगुलंट्स दवाओं का उपयोग किया जा सकता है (1)।
  • सूजन की समस्या को कम करने में ड्यूरेटिक दवाएं मददगार हो सकती हैं (1)।

2. थेरेपी

स्क्लेरोडर्मा के लक्षणों को कम करने के लिए कुछ थेरेपी का उपोग भी कारगर हो सकता है जैसे कि (2):

  • लाइट थेरेपी - इसका उपयोग त्वचा को सख्त और मोटा होने से रोकने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा, कुछ फिजिकल थेरेपी जैसे कि फिजियो थेरेपी कराने से भी शारीरिक समस्या में फायदेमंद हो सकता है।
  • इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी- इस थेरेपी में प्रतिरक्षा प्रणाली की गतिविधि को रोका जाता है। इसके द्वारा प्रतिरक्षा प्रणाली की सक्रियता को नियंत्रित करके स्कलेरोडर्मा का उपचार करने की कोशिश की जाती है (1)।
  • ऑक्सीजन थेरेपी- स्क्लेरोडर्मा की समस्या को कम करने के लिए ऑक्सीजन थेरेपी का उपयोग किया जा सकता है। ऑक्सीजन का उपयोग करके स्क्लेरोडर्मा रोग से जुड़े विकार की चिकित्सा की जा सकती है (1)।

आगे है कुछ खास

लेख के इस हिस्से में हम बता रहे हैं कि त्वग्काठिन्य से बचने के उपाय क्या हैं।

त्वग्काठिन्य (स्क्लेरोडर्मा) से बचने के उपाय – Prevention Tips for Scleroderma in Hindi

कुछ जरूरी उपायों को अपनाकर त्वग्काठिन्य रोग से बचा जा सकता है। यहां हम उन उपायों के बारे में विस्तार से बताएंगे (3)।

  • कपड़े, दस्ताने और मोजे पहनकर खुद को गर्म रखने की कोशिश करें। जब भी संभव हो ठंडे स्थान और ठंडे मौसम से बचें।
  • ठंडे या नम वातावरण से बचने की कोशिश करें, क्योंकि ये लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं।
  • धूम्रपान करने से बचें।
  • बाहर जाने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगाएं।
  • त्वचा को मुलायम बनाए रखने के लिए त्वचा पर मॉइस्चराइजर लगाएं।
  • ठंड के मौसम में अपने घर की हवा को नम करने के लिए ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल करें।
  • हॉट बाथ से बचें, क्योंकि गर्म पानी त्वचा को शुष्क बना सकती है।
  • त्वचा को रूखा करने वाले साबुन और घरेलू क्लीनर का इस्तेमाल करने से बचें। यदि ऐसे उत्पादों का उपयोग करते हैं, तो रबर के दस्ताने पहनें।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • चेकअप के लिए नियमित रूप से डेंटिस्ट और फीजिशियन से संपर्क करें।
  • शरीर में होने वाले किसी भी बदलाव को हल्के में न लें।

माना जाता है कि त्वग्काठिन्य यानी स्क्लेरोडर्मा एक लाइलाज बीमारी है, लेकिन त्वग्काठिन्य के कारण को समझकर और इससे बचने के उपायों को अपनाकर सुरक्षित रहा जा सकता है। इस लेख के माध्यम से हमने न सिर्फ त्वग्काठिन्य से बचने के उपाय बताए हैं, बल्कि त्वग्काठिन्य का इलाज कैसे किया जाता है, इसकी जानकारी भी दी है। त्वग्काठिन्य के लक्षण को पहचान कर समय रहते इसे बढ़ने से रोकने के लिए कदम उठाना ही समझदारी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्क्लेरोडर्मा का सर्वाइवल रेट क्या है?

स्क्लेरोडर्मा का सर्वाइवल रेट 61 से लेकर 80 प्रतिशत तक माना गया है (5)।

क्या स्क्लेरोडर्मा का इलाज किया जा सकता है?

जैसा कि हमने बताया कि इसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन कुछ उपायों को अपनाकर इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है।

स्क्लेरोडर्मा होने पर क्या होता है?

स्क्लेरोडर्मा होने पर त्वचा का कुछ हिस्सा मोटा और कठोर हो जाता है (1)।

स्क्लेरोडर्मा के दो प्रकार कौन-कौन से हैं?

स्क्लेरोडर्मा के दो प्रकार लोकलाइज्ड और सिस्टमिक स्क्लेरोडर्मा हैं (1)।

यदि स्क्लेरोडर्मा का उपचार न किया जाए, तो क्या होगा?

यदि स्क्लेरोडर्मा का उपचार न किया जाए ,तो यह बीमारी जानलेवा हो सकती है (1)।

स्क्लेरोडर्मा में किन खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए?

स्क्लेरोडर्मा होने पर ऐसे खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए, जो लक्षणों को बढ़ा दें। सिस्टमिक स्क्लेरोडर्मा में पाचन तंत्र प्रभावित होता है, इसलिए अधिक फाइबर युक्त आहार का सेवन करने से बचें (6)। साथ ही खट्टे फल, टमाटर से बने प्रोडक्ट्स, तला हुआ भोजन, कॉफी, लहसुन, प्याज और पुदीने से बचना चाहिए।

इसके अलावा, गैस का कारण बनने वाले खाद्य पदार्थों, जैसे कि कच्ची मिर्च, बीन्स, ब्रोकोली, कच्चा प्याज, मसालेदार भोजन, कार्बोनेटेड पेय पदार्थ और शराब के सेवन से भी बचना चाहिए। साथ ही सोने से दो-तीन घंटे पहले खाना न खाने की सलाह दी जाती है।

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