प्रस्तुतकर्ता
Sunita Regmi
Pregnancy
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
स्क्लेरोडर्मा एक दुर्लभ बीमारी है, जिसे त्वग्काठिन्य भी कहते हैं। ‘स्कलेरो’ का अर्थ कठोर होना और ‘डर्मिस’ का संबंध त्वचा से है। इसमें कनेक्टिव टिश्यू डिसआर्डर यानी टिश्यू से संबंधित समस्या होती है, जिसके कारण त्वचा मोटी और सख्त हो जाती है।
आसान शब्दों में स्क्लेरोडर्मा का अर्थ बताएं, तो यह शरीर के स्वस्थ्य टिश्यू को प्रभावित करके त्वचा को कठोर बनाने वाली बीमारी है (1)।
स्क्लेरोडर्मा की समस्या 30 से 50 साल की उम्र के लोगों को प्राभावित कर सकती है। इसका एक प्रकार पुरुषों की अपेक्षा महिलओं को अधिक प्रभावित करता है (1)।
एक अन्य वैज्ञानिक लेख में इस बात का जिक्र मिलता है कि स्क्लेरोडर्मा एक प्रकार का ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर हमला कर उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है (2)।
त्वग्काठिन्य के बारे में जानने के बाद स्क्लेरोडर्मा के प्रकार पर एक नजर डाल लें।
स्क्लेरोडर्मा यानी त्वग्काठिन्य दो प्रकार के होते हैं, जिनके बारे में हम नीचे विस्तार से बता रहे हैं।
1. लोकलाइज्ड स्क्लेरोडर्मा (Localized scleroderma): स्क्लेरोडर्मा रोग का यह प्रकार मुख्य रूप से त्वचा को प्रभावित करता है। इससे मांसपेशियां और हड्डियां प्रभावित हो भी सकती हैं और नहीं भी। यह स्कलेरोडर्मा ज्यादातर महिलाओं को ही होता है।
प्रतिवर्ष लगभग एक लाख में से 3 महिलाएं इसकी चपेट में आती हैं। लोकलाइज्ड स्क्लेरोडर्मा व्यक्ति के शरीर के जिस हिस्से को यह प्रभावित करता है, उसी हिसाब से इसे दो भागों में बांटा जाता है, जिसमें से एक है मोर्फिया और दूसरा लीनियर स्कलेरोडर्मा है (1)।
मोर्फिया: मॉर्फिया के मामलों वयस्कों में ज्यादा देखे जाते हैं। इसे स्क्लेरोडर्मा का प्लाक फॉर्म भी कहा जाता है (1)। प्लाक का अर्थ हुआ स्किन के ऊपर बनना वाला छोटा और आसामान्य पैच। इससे हाथ और पैरों को छोड़कर छाती, पेट और लिंब की त्वचा प्रभावित होती है (2)।
यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, लेकिन बहुत कम मामलों में पूरे शरीर तक फैलता है। इससे अंदरुनी अंगों के विफल होने यानी इंटरनल ऑर्गन फेलियर का खतरा भी ना के बराबर होता है (2)। रिसर्च में कहा गया है कि प्लाक के फैलने के पैर्टन के आधार पर इसे कई अन्य उप-प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है (1)।
लीनियर स्क्लेरोडर्मा: यह स्क्लेरोडर्मा मोटा और सख्त होता है, जो त्वचा पर बैंड यानी पट्टे जैसा दिखाई देता है। यह स्कलेरोडर्मा चेहरे या हाथों पर हो सकता है। रिसर्च के अनुसार, लीनियर स्क्लेरोडर्मा ज्यादातर बच्चों को प्रभावित करता है (1)।
2. सिस्टमिक स्क्लेरोडर्मा (Systemic scleroderma): स्क्लेरोडर्मा का यह रूप सबसे गंभीर होता है, क्योंकि यह कई आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकता है। इसमें त्वचा के साथ ही हृदय, फेफड़े और किडनी भी शामिल हैं (2)।
पाचन तंत्र को भी सिस्टमिक स्कलेरोडर्मा प्रभावित कर सकता है। यूं तो यह स्क्लेरोडर्मा किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन इसे बच्चों और बुजुर्गों में दुर्लभ माना जाता है। यह रोग 30 से 50 वर्ष की आयु के व्यक्तियों को सबसे अधिक प्रभावित करता है (1)।
आगे हम आपको त्वग्काठिन्य के कारण बता रहे हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, त्वग्काठिन्य के कारण पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। हां, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि आनुवंशिक यानी जेनेटिक और पर्यावरणीय कारक स्क्लेरोडर्मा की उत्पत्ति का कारण हो सकते हैं (1)। इनके बारे में और इसके कुछ अन्य कारक के बारे में आगे विस्तार से पढ़ें (3)।
नीचे स्क्रॉल करें
कारण के बाद जानते हैं त्वग्काठिन्य के लक्षण के बारे में।
त्वग्काठिन्य रोग में विभिन्न प्रकार के लक्षण नजर आ सकते हैं। यहां हम स्क्लेरोडर्मा के कारण प्रभावित होने वाले सभी अंगों से जुड़े लक्षण बता रहे हैं (2)।
त्वचा संबंधी लक्षण:
हड्डी और मांसपेशियों से संबंधित लक्षण:
सांस से जुड़े लक्षण:
पाचन तंत्र से जुड़े लक्षण:
हृदय से जुड़े लक्षण:
किडनी और जननांग से संबंधित लक्षण:
आगे पढ़ें
लेख के अगले भाग में हम त्वग्काठिन्य के जोखिम कारक बताएंगे।
स्क्लेरोडर्मा किसी को भी हो सकता है, लेकिन अगर किसी के परिवार में यह समस्या चली आ रही है, तो यह अपने आप में ही स्कलेरोडर्मा होने का सबसे बड़ा जोखिम कारक हो सकता है। इसके अलावा, स्क्लेरोडर्मा के जोखिम कारक कुछ इस प्रकार हो सकते हैं (4) (1)।
लेख में बने रहें
अब आगे बढ़ते हुए स्क्लेरोडर्मा के निदान के बारे में जान लीजिए।
त्वग्काठिन्य रोग के निदान के लिए डॉक्टर कई प्रकार की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इनके बारे में हम नीचे बता रहे हैं (2)।
अंत तक पढ़ें
निदान की जानकारी के बाद अब पढ़िए त्वग्काठिन्य का इलाज कैसे किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार फिलहाल स्क्लेरोडर्मा का कोई सटीक इलाज मौजूद नहीं है। फिर भी कुछ उपायों को अपनाकर इसके लक्षण और रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है। यहां हम उन्हीं उपायों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं (1)।
स्क्लेरोडर्मा की समस्या हो दूर करने वाली दवा का अभी तक इजात नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी कुछ दवाओं का उपयोग कर स्क्लेरोडर्मा के लक्षणों को नियंत्रित करने और जटिलताओं को रोकने में मदद मिल सकती हैं। इनमें निम्न दवाओं को शामिल किया गया है (2):
स्क्लेरोडर्मा के लक्षणों को कम करने के लिए कुछ थेरेपी का उपोग भी कारगर हो सकता है जैसे कि (2):
आगे है कुछ खास
लेख के इस हिस्से में हम बता रहे हैं कि त्वग्काठिन्य से बचने के उपाय क्या हैं।
कुछ जरूरी उपायों को अपनाकर त्वग्काठिन्य रोग से बचा जा सकता है। यहां हम उन उपायों के बारे में विस्तार से बताएंगे (3)।
माना जाता है कि त्वग्काठिन्य यानी स्क्लेरोडर्मा एक लाइलाज बीमारी है, लेकिन त्वग्काठिन्य के कारण को समझकर और इससे बचने के उपायों को अपनाकर सुरक्षित रहा जा सकता है। इस लेख के माध्यम से हमने न सिर्फ त्वग्काठिन्य से बचने के उपाय बताए हैं, बल्कि त्वग्काठिन्य का इलाज कैसे किया जाता है, इसकी जानकारी भी दी है। त्वग्काठिन्य के लक्षण को पहचान कर समय रहते इसे बढ़ने से रोकने के लिए कदम उठाना ही समझदारी है।
स्क्लेरोडर्मा का सर्वाइवल रेट 61 से लेकर 80 प्रतिशत तक माना गया है (5)।
जैसा कि हमने बताया कि इसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन कुछ उपायों को अपनाकर इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है।
स्क्लेरोडर्मा होने पर त्वचा का कुछ हिस्सा मोटा और कठोर हो जाता है (1)।
स्क्लेरोडर्मा के दो प्रकार लोकलाइज्ड और सिस्टमिक स्क्लेरोडर्मा हैं (1)।
यदि स्क्लेरोडर्मा का उपचार न किया जाए ,तो यह बीमारी जानलेवा हो सकती है (1)।
स्क्लेरोडर्मा होने पर ऐसे खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए, जो लक्षणों को बढ़ा दें। सिस्टमिक स्क्लेरोडर्मा में पाचन तंत्र प्रभावित होता है, इसलिए अधिक फाइबर युक्त आहार का सेवन करने से बचें (6)। साथ ही खट्टे फल, टमाटर से बने प्रोडक्ट्स, तला हुआ भोजन, कॉफी, लहसुन, प्याज और पुदीने से बचना चाहिए।
इसके अलावा, गैस का कारण बनने वाले खाद्य पदार्थों, जैसे कि कच्ची मिर्च, बीन्स, ब्रोकोली, कच्चा प्याज, मसालेदार भोजन, कार्बोनेटेड पेय पदार्थ और शराब के सेवन से भी बचना चाहिए। साथ ही सोने से दो-तीन घंटे पहले खाना न खाने की सलाह दी जाती है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें